राजनीति अस्थिरता फैलाने वाले कालनेमी भी सीएम के निशाने पर

Uttarakhand

देहरादून। समाज में फैले कालनेमियों पर सीएम पुष्कर सिंह धामी की कार्रवाई के बाद भले ही ये कालनेमी शब्द अब चर्चा में आया हो, लेकिन सीएम धामी राजनीति के कालनेमियों के खिलाफ चार साल से ही अभियान चलाए हुए हैं। उत्तराखंड को राजनीतिक रूप से अस्थिर कर कमजोर करने वाले कालनेमियों के लिए ये पहला मौका है, जब उनका हर वार उल्टा उन्हीं को नुकसान पहुंचा रहा है। दिल्ली से लेकर देहरादून तक अपने मीडिया में बैठे खरदूषणों के जरिए साजिशों का जाल फैलाने वाले कालनेमियों को राज्य के 25 साल के इतिहास में पहली बार सबक मिला है। हर किसी विधायक को प्रदेश अध्यक्ष और सीएम बनाने का सपना दिखा कर अपनी दुकान सजा कर रखने वाले कालनेमी भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद पर महेंद्र भट्ट की वापसी से सदमे में हैं।
प्राकृतिक संसाधनों, कुदरत की दी हुई खूबसूरती से परिपूर्ण उत्तराखंड को एक विकसित राज्य बनने के हर मार्ग पर यही कालनेमी बैठे रहे। कभी भी किसी भी सरकार को इन कालनेमियों ने कभी भी स्थिर नहीं रहने दिया। हर सरकार को पहले ही दिन से उखाड़ फैंकने की साजिश रची गई। 2017 से 2022 के बाद से कालनेमियों की साजिशों में तेजी से इजाफा हुआ। इस बीच कुछ कालनेमियों ने दिल्ली में अपने भौकाल का हौव्वा खड़ा कर पूरे समय तत्कालीन मुख्यमंत्रियों को हमेशा परेशान कर रखा। उनकी कुर्सी को हर छह महीने में हिलाने का खेल खेला जाता रहा। मीडिया और डिजिटल प्लेटफार्म पर कभी खबरों तो कभी गीतों के माध्यम से कमजोर सीएम साबित करने का हर खेल खेला गया।
मीडिया के हल्कों में यही साबित किया गया कि यदि इस कालनेमी को उत्तराखंड का सिरमौर बना दिया जाए तो रातों रात इस उत्तराखंड की सूरत बदल जाएगी। हर बार दिखाया गया कि इस बार तो हर हाल में कालनेमी ने ही उत्तराखंड का सीएम बनना है। कालनेमी की साजिशों का दौर चलता रहा। इन साजिशों के चलते एक के बाद एक राज्य के सीएम बदलते चले गए। जुलाई 2021 में सीएम पुष्कर सिंह धामी के हाथों में कमान आई तो कालनेमियों ने हल्ला मचाया कि उत्तराखंड में भाजपा की सीटों का आंकड़ा दहाई के अंक को भी पार नहीं कर पाएगा। इन आंकड़ेबाजियों ने भाजपा कार्यकर्ताओं के मनोबल को धराशयी करने का हर संभव प्रयास किया। इन तमाम षड़यंत्रों के बावजूद 10 मार्च 2022 का दिन आया। इस दिन वो हुआ जो आज तक उत्तराखंड के इतिहास में कभी नहीं हुआ। कोई पार्टी दोबारा लगातार सत्ता में वापसी कर रही थी। वो भी 47 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, मार्गदर्शन में इस जीत के नायक पूरे उत्तराखंड में भाजपा को जिताने के कारण अपनी सीट गंवा बैठे।
ऐसा होते ही फिर कालनेमी एक्टिव हुए। हर बार की तरह इस बार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सब समझे हुए थे। उन्होंने अपने सेनापति पुष्कर सिंह धामी पर भरोसा जताते हुए उन्हें दोबारा उत्तराखंड की कमान सौंपी। उम्मीद थी कि शायद अब उत्तराखंड के कालनेमी शांत होंगे, लेकिन इस बार वे अधिक तीव्र रफ्तार से अपनी नई नई साजिशों के साथ लौटे। अंकिता भंडारी हत्याकांड, हाकम सिंह नकल माफिया से लेकर तमाम दूसरे मामलों में जमकर रायता फैलाने का काम किया गया। ऐसा माहौल बनाया कि सरकार को छह महीने में ही उखाड़ फैंकने का जैसा संकल्प ले लिया हो। अब पानी सिर से ऊपर हो चुका था। इसके बाद उत्तराखंड के कालनेमियों के खिलाफ वो हुआ, जिसकी इस उत्तराखंड को बहुत पहले जरूरत थी।
एक के बाद एक कालनेमी के षडयंत्र बेनकाब होते चले गए। एक के बाद एक कालनेमी की कलई दर कलई खुलती चली गई। 2022 में महेंद्र भट्ट के अध्यक्ष बनने, 2024 में अजय टम्टा के केंद्र में मंत्री बनने और फिर 2025 में दोबारा महेंद्र भट्ट के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद कालनेमी शीशे के सामने पूरी तरह नंगे हो गए। अब सभी वो विधायक जिन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने का सपना दिखाया गया, वो सभी कालनेमी को तलाश रहे हैं। राज्य की जनता भी सीएम पुष्कर सिंह धामी को इन कालनेमियों से राज्य को बचाने को धन्यवाद दे रही है।

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